June 23, 2024
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‘फिर से बम-बम बोल रही है काशी’, वाराणसी का इतिहास ही नहीं, राजनीति भी है दिलचस्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से अपना नामांकन मंगलवार को दाखिल किया। बनारसी साड़ी-पान, अस्सी घाट, मोक्षदायिनी गंगा और बाबा विश्वनाथ के साथ ही काशी की राजनीति भी दिलचस्प रही है। जानिए इस रिपोर्ट में-

भगवान शिव की नगरी काशी, जो दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक मानी जाती  है। काशी, बनारस या वाराणसी जो भी कह लें, यह शहर इतिहास से भी अधिक प्राचीन बताया जाता है। परंपराओं और आध्यात्मिक परिदृश्य की बात करें तो ये नगरी शिव-शक्ति के दम-दम और बाबा भोले के बम-बम की ध्वनियों से हमेशा गूंजती रहती है। यहां पवित्र नदी गंगा है, तो भोले शंकर के रूप में साक्षात बाबा विश्वनाथ भी विराजमान हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि काशी में मोक्षदायिनी गंगा के किनारे बने मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट सहित अस्सी घाट के लिए यह विश्व विख्यात है। गंगा और इसके पवित्र घाटों के कारण यह शहर एक तरफ तो हिंदुओं की तीर्थ स्थली है तो वहीं यह शहर मुस्लिम कारीगरों के हुनर के लिए भी विश्वविख्यात है। गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाती काशी को दीपों का शहर और ज्ञान नगरी भी कही जाती है।

भगवान शिव की नगरी काशी, जो दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक मानी जाती  है। काशी, बनारस या वाराणसी जो भी कह लें, यह शहर इतिहास से भी अधिक प्राचीन बताया जाता है। परंपराओं और आध्यात्मिक परिदृश्य की बात करें तो ये नगरी शिव-शक्ति के दम-दम और बाबा भोले के बम-बम की ध्वनियों से हमेशा गूंजती रहती है। यहां पवित्र नदी गंगा है, तो भोले शंकर के रूप में साक्षात बाबा विश्वनाथ भी विराजमान हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि काशी में मोक्षदायिनी गंगा के किनारे बने मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट सहित अस्सी घाट के लिए यह विश्व विख्यात है। गंगा और इसके पवित्र घाटों के कारण यह शहर एक तरफ तो हिंदुओं की तीर्थ स्थली है तो वहीं यह शहर मुस्लिम कारीगरों के हुनर के लिए भी विश्वविख्यात है। गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाती काशी को दीपों का शहर और ज्ञान नगरी भी कही जाती है।

इस शहर का समृद्ध इतिहास और इससे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें भी हैं तो वहीं गंगा के विभिन्न घाटों की अपनी अलग ही कहानी है। माना जाता है कि काशी या वाराणसी करीब 3000 साल पुरानी नगरी है। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह शहर 4000-5000 साल से भी पुराना है। काशी कई सदियों से दुनियाभर में सांस्कृतिक और धार्मिक केन्द्र रही है तो वहीं शिक्षा और खानपान के मामले में भी यह नगरी जानी जाती है। 

काशी का वाराणसी नाम कैसे पड़ा

इस शहर का नाम वाराणसी भी है जो यहां मौजूद दो स्थानीय नदियों वरुणा नदी और असि नदी से मिलकर बना है। ये दोनों नदियां क्रमशः उत्तर और दक्षिण से आकर गंगा नदी में मिलती हैं और इस वजह से इसका नाम वाराणसी पड़ा। काशी की उत्पत्ति की बात करें, तो धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान शिव ने स्वयं काशी नगरी की स्थापना की थी। कहा जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। यहां भोलेनाथ स्वयं काशी विश्वनाथ के रूप में विराजमान है, जो 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। 

काशी का राजनीतिक महत्व

काशी के राजनीतिक महत्व की बात करें तो यह शहर पिछले 10 सालों से भारतीय राजनीति का केंद्र बिंदु बना हुआ है, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संसदीय क्षेत्र है। दो बार वाराणसी लोकसभा सीट से अप्रत्याशित जीत दर्ज करने के बाद अब तीसरी बार प्रधानमंत्री मोदी ने इसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए मंगलवार, 14 मई को अपना नामांकन दाखिल किया है और इस सीट से उनकी तीसरी पारी है। बता दें कि साल 2014 में पहली बार जीत दर्ज कर काशी पहुंचे पीएम मोदी ने गंगा की सीढ़ियों पर अपना मत्था टेका था। काशी से नरेंद्र मोदी का गहरा नाता है, वो इस नगरी को अपनी माता के समान मानते हैं और बार-बार कहते हैं कि यहां मुझे मां गंगा ने बुलाया है।

नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से बड़ी जीत दर्ज की है

पीएम नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में जब पहली बार काशी से चुनाव लड़ा था तो उन्होंने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को 371,784 वोटों के भारी अंतर से हराया था। तब नरेंद्र मोदी को 581,022 वोट मिले थे जबकि अरविंद केजरीवाल को 209,238 वोट मिले थे और इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय को महज 75,614 वोट ही मिले थे। अजय राय कांग्रेस के टिकट पर इस बार फिर काशी से उम्मीदवार हैं।

साल 2019 में दूसरी बार नरेंद्र मोदी काशी से जीत दर्ज कर फिर इसी सीट से सांसद बने। इस बार नरेंद्र मोदी ने साल 2014 के मुकाबले और बड़ी जीत दर्ज की और उन्होंने समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार शालिनी यादव को 479,505 वोटों हराया था। नरेंद्र मोदी को 674,664 जबकि सपा उम्मीदवार शालिनी यादव को 195,159 वोट मिले थे जबकि तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय को 152,548 वोट मिले थे।

काशी का राजनीतिक इतिहास

ठाकुर रघुनाथ सिंह काशी सीट के पहले सांसद थे। साल 1952 में हुए पहले चुनाव में  रघुनाथ सिंह ने यहां से जीत हासिल की थी और इसके बाद वह 1957 और 1962 में भी यहां से लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह लगातार तीन बार यहां से सांसद रहे और फिर 1967 में इस सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सत्यनारायण सिंह ने जीत दर्ज की थी। साल 1971 के चुनाव में कांग्रेस के राजाराम शास्त्री, 1977 में जनता पार्टी के चंद्रशेखर, 1980 और 1984 में कांग्रेस पार्टी के कमलापति त्रिपाठी और 1989 में जनता दल के अनिल शास्त्री इस सीट से जीते और सांसद बने।

साल 1991, 1996, 1998 और 1999 में यहां लगातार चार बार भारतीय जनता पार्टी ने वापसी की और इस सीट से जीत दर्ज की । 2004 में इस सीट से कांग्रेस जीती और फिर साल 2009 से 2019 तक बीजेपी लगातार यहां से जीत दर्ज करती रही है। साल 2009 में यहां से भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी जीत कर सांसद बने थे और इसके बाद 2014 और 2019 में नरेद्र दामोदर दास मोदी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और सांसद बने।

गंगा के 88 घाटों की नगरी है काशी

काशी शहर में गंगा के किनारे कुल 88 घाट हैं, जिसमें से अधिकांश घाटों पर स्नान और पूजा समारोह होते हैं, जबकि दो घाटों का उपयोग विशेष रूप से श्मशान स्थलों के रूप में किया जाता हैं। कुल 12 घाट चर्चित घाट हैं। यह नगरी कबीर, रविदास, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया और उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जैसे कलाकारों की नगरी रही है। इतना ही नहीं, गंगा की भव्य आरती और देश-विदेश के पर्यटकों से यह शहर रौशन रहता है और रातों दिन यहां चहल-पहल देखी जाती है। 

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